Sunday, 28 February 2021

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद की पुण्यतिथि पर उन्हें नमन

आज भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का पुण्यतिथि है। हमारे यूवाओं को उनके बारे मे जानना ज़रूरी है।
उनका जन्म 3 दिसंबर 1884 को बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में हुआ था।  वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में भी अपना योगदान दिया था। पूरे देश मे अत्यंत लोकप्रिय होने के कारण उन्हें राजेंद्र बाबू या देशरत्न कह कर पुकारा जाता था।
वह 1950 में संविधान सभा की अंतिम बैठक में राष्ट्रपति चुने गए और 26 जनवरी 1950 से 13 मई 1962 तक देश के राष्ट्रपति रहे। राजेंद्र प्रसाद एक मात्र नेता रहे जिन्हें दो बार लगातार राष्ट्रपति पद के लिए चुना गया।  पेशे से वकील राजेंद्र बाबू महात्मा गांधी की प्रेरणा से वकालत छोड़ कर स्वतंत्रता संग्राम में उतरने का फैसला किया। भारत की आज़ादी की लड़ाई में उन्होंने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। राजेंद्र बाबू को 1931 में सत्याग्रह आंदोलन और 1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन के लिए महात्मा गांधी के साथ जेल भी जाना पड़ा था। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद 1934-1935 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। राष्ट्र के प्रति उनके योगदान को देखते हुए उन्हें देश के सबसे बड़े पुरस्कार भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया।

राजेंद्र बाबू अपने विद्यार्थी जीवन में काफी कुशाग्र बुद्धि वाला छात्र माने जाते थे। वह इतने बुद्धिमान थे कि एक बार परीक्षा के दौरान उत्तर पुस्तिका की जांच करने वाले अध्यापक ने उनकी उत्तर पुस्तिका पर लिख दिया था कि " परीक्षा देने वाला परीक्षा लेने वाले से ज्यादा बेहतर है।"  उन्होंने अपनी पढ़ाई के कारण गोपाल कृष्ण गोखले के द्वारा दिए गए " इंडियन सोसायटी " से जुड़ने का प्रस्ताव को ठुकरा दिया। राजेंद्र बाबू ने अलग अलग विषय में खुद को साबित किया था। अगर वह चाहते तो एक प्रशासनिक अधिकारी बन सकते थे। लेकिन उन्हें यह स्वीकार नहीं था। आज़ादी की कीमत उन्हें पता था इसलिए देश को मजबूत नींव देने के लिए वह राजनीति में आए।  उनके जीवन से छात्रों को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। संघर्ष, मेहनत और कामयाबी की मिशाल है डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद। राजेंद्र बाबू ने राष्ट्र का मान बढ़ाने के साथ ही देशवासियों का
मार्गदर्शन किया। उन्होंने अपने जीवनकाल में देश की सेवा कर साबित किया कि राष्ट्र ही सर्वोपरि है।  इससे बढ़ कर और कुछ भी नही। उन्होंने कहा था कि जो लोग सोचते हैं कि राजनीति अच्छे लोग या पढ़े लिखे लोगों के लिए नहीं है। यह पुरी तरह से गलत है। उनके जयंती समारोह को लोग राष्ट्रीय मेघा दिवस के रूप में मनाते हैं।

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का जीवन सादगी एवं त्याग का प्रतीक था। राष्ट्रपति के पद पर रहने के बावजूद उनकी सादगी आज भी लोगों को प्रेरित करती है। राजेंद्र बाबू का कहना था कि दिखावट, फिजूलखर्ची अच्छे मनुष्य का  लक्षण नहीं। वह चाहे कितना ही
बडा आदमी क्यों न हो। फिजूलखर्च करने वाला समाज का अपराधी है क्योंकि बढ़े हुए खर्चों की पूर्ति अनैतिक तरीके से नहीं तो और कहां से करेगा ? शायद उनकी
सादगी के कारण जवाहर लाल नेहरु और उनमें मतभेद थे। राजेंद्र बाबू और नेहरू के वैचारिक और व्यावहारिक मतभेद किसी से छुपा नहीं है। राजेन्द्र बाबू जहां हिन्दू परंपरावादी थे वहीं नेहरू आधुनिक और पश्चिम सोच वाले थे।
अप्रतिम प्रतिभा के धनी एवं सादा जीवन उच्च विचार के प्रतीक राजेंद्र बाबू देश वासियों के लिए सदा प्रेरणा श्रोत रहेंगे।


Monday, 11 January 2021

लाल बहादुर शास्त्री की पुण्य तिथि पर उन्हें नमन

भारत के द्वितीय प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु 11 जनवरी को हुईं थी। शास्त्री जी की ईमानदारी अनुकरणीय है।
उनके आदर्शों एवं ईमानदारी कि चर्चा लोग आज भी करते हैं और आने  वाली पीढ़ी को भी अवगत कराना चाहिए। 

भारत - पाक युद्ध 1965 के कुछ ही दिनों के बाद शास्त्री जी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में भाषण के दौरान चुटकी ली थी। उन्होंने कहा था " सदर अयूब ने कहा था कि वह दिल्ली तक चहल कदमी करते हुए पहुंच जाएंगे। तब मैंने सोचा था कि अयूब को  क्यों तकलीफ दी जाए हम ही लाहौर की तरफ बढ़ जाएं। ये वही शास्त्री जी थे जिनके पांच फीट दो इंच के कद और आवाज़ का अयूब ने मज़ाक उड़ाया था।
शास्त्री जी बहुत सरल स्वभाव के थे लेकिन स्वाभिमानी थे।     1965 की युद्ध के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने शास्त्री जी को धमकी दी थी कि अगर आपने पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई बंद नहीं की तो हम आपको पीएल के तहत जो लाल गेहूं भेजते हैं उसे बंद कर देंगे। उस समय भारत गेहूं के उत्पादन में आत्म निर्भर नहीं था।  शास्त्री जी को ये बात बहुत चुभी क्योंकि वह स्वाभिमानी व्यक्ति थे। उन्होंने देशवासियों को कहा कि हम सफ्ताह में एक वक़्त भोजन नहीं करेंगे। ऐसा  कहने के पहले उन्होंने अपनी पत्नी से चर्चा किया था। उनकी एक पुकार पर लाखों भारतीयों ने छोड़ दिया था एक वक़्त का खाना। 
एक और घटना का जिक्र करना ज़रूरी है। एक बार अमेरिकी राजदूत चेस्टर बोल्स ने शास्त्री जी से मिलकर अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन का अमेरिका आने का न्योता दिया। लेकिन पाकिस्तान के दवाब पर  अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपना न्योता वापस ले लिया था।  यह बात शास्त्री जी को अच्छी नहीं लगी। कुछ दिनों बाद वही राष्ट्रपति ने जब उन्हें कनाडा जाते हुए वॉशिंगटन में रुकने का न्योता दिया तो शास्त्री जी ने उसे ठुकरा दिया। 

शास्त्री जी की ईमानदारी की चर्चा आज भी होती है। 1963 में शास्त्री जी जब गृह मंत्री थे तो उन्हें किसी कारण इस्तीफा देना पड़ा था। इस्तीफे के बाद वह अपने घर के खर्च अखबारों में लिख कर चलाते थे। जाने माने पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक में जिक्र किया था कि वे बेवजह बिजली खर्च नहीं करते थे। जिस कमरे में अगर कोई नहीं होता था तो कमरा में अंधेरा ही रहता था। 
एक बार उनके बेटे उनकी सरकारी गाड़ी इंपाला ले कर घूमने के लिए गए। जब शास्त्री जी  को इस बात का पता लगा तो उन्होंने ड्राइवर से कहा कि इसे निजी इस्तेमाल के मद में लिखे और अपनी पत्नी को निर्देश दिया कि प्रति कि•मी• के हिसाब से जितना पैसा बनता है उसे सरकारी खाते में जमा कराए। 
आज के नेता लाव लश्कर के साथ सड़कों पर निकलते है। उनके बच्चे विदेशी गाड़ियों में घूमते हैं और विदेशों में पढ़ते हैं।  आज के सभी नेता आलीशान घरों में रहते हैं और महंगे कपड़े पहनते हैं।
शास्त्री जी कार्य शैली भी अदुभूत थी।  उनमें शासन की सूझ बुझ थी।  उनकी कार्य शैली नेहरू जी से अलग थी। नेहरू जी बड़े उद्यम सरकारी नियंत्रण में लगाना चाहते थे। यही नहीं पूरे देश का आर्थिक विकास भी सरकारी नियंत्रण से करना चाहते थे। जबकि शास्त्री जी उद्योगों में निवेश कम कर के खाद्य तथा खेती में निवेश बढ़ाने के पक्षधर थे। नेहरू निजी उद्दमों और निर्यात को ज़रूरी नहीं समझते थे जबकि शास्त्री ने इसे बढ़ावा दिया। नेहरू के कार्यकाल में निर्यात को बढ़ावा नहीं देने की वजह से " भुगतान  संतुलन " की स्थिति बुरी हो गई थी लेकिन शास्त्री जी ने विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देकर , निर्यात को बढ़ा कर एवं खेती में निवेश बढ़ाकर भारत की आर्थिक स्थिति को मजबूती दी।  उन्होंने भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगाया। 
उनकी मृत्यु जल्दी ही गई । अगर कुछ दिन और जीवित होते और प्रधान मंत्री बने रहे   होते तब भारत सत्तर के दशक में ही तरक्की कर लिया होता।  यही नहीं वंशवाद भी खत्म हो गया होता। 
पुण्य तिथि पर उन्हें नमन 🙏🙏 🌹


Monday, 28 December 2020

अरुण जेटली के जयंती पर विशेष

वकील से एक सफल राजनेता तक का सफर करने वाले अरुण जेटली जी की आज जयंती है।
अरुण जेटली संवाद के कुशल खिलाड़ी थे। एक बार अरुण जेटली से पूछा गया था कि अच्छा अर्थशास्त्री और चतुर राजनीतिज्ञ के बीच क्या चुनना चाहिए ? तब उन्होन
 बताया था कि यह विकल्प अनुचित है क्योंकि किसी भी सरकार को बने रहने और प्रदर्शन के लिए दोनों की आवश्यकता है। 
वह राजनीति के चाणक्य थे। जेटली प्रखर बौद्धिक क्षमता वाला, भारत के संविधान, इतिहास और प्रशासन में गहरी जानकारी वाले नेता थे।
                               राजनीति में आने से पहले वह सर्वोच्च   
न्यायलय में प्रैक्टिस करते थे। उन्होंने1975 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जय प्रकाश आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था। उस समय वह युवा मोर्चा के संयोजक थे। उस दौरान जेल भी गए। वाजपेई सरकार के दौरान कैबिनेट मंत्री थे। भारतीय संसद के राज्य सभा में विपक्ष के नेता भी रहे। 
उनके मित्र हर दल में थे। प्रतिदिन पार्क में सैर करने करने के बाद लोगों के साथ बैठ कर देश दुनिया पर चिंतन करते थे।
उन्हें भाजपा के संकट मोचक के रूप में देखा जाता था। आज किसानों का आन्दोलन पिछले एक महीने से ज्यादा दिनों से चल रहा है। सभी मानते हैं कि अगर अरुण जेटली जीवित होते तो किसानों का आन्दोलन इतने लंबे समय तक नहीं चलता। वह कोई न कोई समाधान ज़रूर निकाल लेते। उनका स्वास्थ उनका साथ नहीं दिया। वे 66 वर्ष के उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया।
अरुण जेटली का नाम हमेशा भारतीय जनता पार्टी के स्वर्णिम इतिहास में शामिल रहेगा।



 

Thursday, 24 December 2020

किसान - बंजर भूमि में बोता है आशाओं का बीज


एक ख्वाहिश,
एक सपना,
एक भूख,
एक मातृ प्रेम।
इन सब का मिला जुला रूप
किसान।
बंजर भूमि में बोता है
आशाओं का बीज।
दीमक - कांटों से बचाने को 
लाता है दवा उधार में।
उधार का पानी, उधार की खाद,
उधार की बिजली, देनदार की वसूली।
मेहनत का मूल्य 
शून्य .......।
चिड़ियों की चहकने से, उल्लू के जगने तक
लहलहाती मां का सपना लिऐ 
अनवरत कार्मशील।
प्रस्फुटन बीजों का नये उगते पत्ते।
मौसम की प्रताड़ना को निरंतर सहते हुए 
करता है मां का श्रंगार।
बीवी, बच्चों को भरपेट भोजन 
खिलाने की उम्मीद।
विवशता कर्ज़ चुकाने की ।
घर पहुंचते लिपट गए बच्चे
समझ गए दर्द किसान पिता का
बापू --
हमारा पेट रोटी नहीं मांगता।
हम धरती के , धरती हमारी मां।
चुकाते रहेंगे कर्ज़ 
अपनी मां का।
           प्रशान्त सिन्हा

Monday, 30 November 2020

कार्तिक पुर्णिमा, देव दीपावली, गुरुनानक जयंती और प्रकाश पर्व

कार्तिक पूर्णिमा,  देवदीपावली, गुरुनानक जयंती और प्रकाश पर्व पर संदेश। 
आज के दिन का विशेष महत्व।

आज देश में  कार्तिक पूर्णिमा, देव दीपावली और गुरुनानक देव की जयंती मनाई जा रही है। गुरुपर्व का सिख धर्म में बहुत महत्व है। हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि के दिन गुरुनानक जयंती मनाई जाती है। कार्तिक पूर्णिमा का हिन्दू ओर सिख धर्म में विशेष महत्व है। इस दिन को गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है तो वहीं इस दिन ही प्रकाश पर्व भी मनाया जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन गंगा में डुबकी लगाने के बाद दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है एवं  पापों का नाश होता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विशेष महत्व है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली भी मनाई जाती है। मान्यता है कि भगवान शिव ने इस दिन देवलोक पर हाहाकार मचाने वाले त्रिपुरासुर नाम के राक्षस का संहार किया था और उसके वध के खुशी में देवताओं ने इस दिन दीपावली मनाई थी। 
त्योहारों, उत्सवों के माह कार्तिक की अंतिम तिथि देव दीपावली है। कार्तिक माह के प्रारंभ से ही दीप दान एवं आकाशदीप प्रज्वलित करने की व्यवस्था के पीछे गायत्री मंत्र में आवाहित प्रकाश से धरती को आलोकित करने का भाव रहा है क्योंकि शरद ऋतु से भगवान भास्कर की गति में परिवर्तन होता है। इसके चलते दिन छोटा होने लगता है और रात बड़ी यानी अंधेरे का प्रभाव बढ़ने लगता है। इसलिए इससे लड़ने का उद्दम भी है दीप जलाना।

सिख पंथ के संस्थापक गुरुनानक देव की जयंती पर सभाओं का आयोजन किया जाता है और इन सभाओं में गुरुनानक देव के द्वारा दी गई शिक्षाओं के बारे में बताया जाता है। इस दिन गुरुद्वारों को सजाया जाता है और लंगर का आयोजन किया जाता है। श्री गुरु नानक जी ने सम्पूर्ण विश्व का अन्याय, अत्याचार एवं शोषण के विरूद्ध एक जुट होने का मार्ग दिखाया है। गुरु नानक जी ने " किरत करो, वंड छको " जैसे उपदेश देकर समाज को स्वाभिमान के साथ अपने पैरों पर खड़ा होने में समर्थ किया। गुरुनानक जी ने  स्वयं खेती कर युवाओं को बहुत बड़ा संदेश दिया था सामाजिक सरसता के लिए गुरु जी का जाति धर्म की संकुचित दीवारें तोड़ने के लिए संगत पंगत का आह्वान, काम की प्रतिष्ठा बढ़ाने और बांट कर खाने का सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है। गुरुनानक जी का जीवन, चिंतन व दर्शन काल की सीमा से परे है। 
प्रकाश पर्व अंधकार से लड़ने का संदेश देता है लेकिन केवल अंधेरे से नहीं बल्कि उस तमस से भी जो हमारे मन मस्तिष्क में घर लेता है। कोई भी समाज हो उसे भौतिक समृद्धि के साथ आत्मिक शान्ति भी चाहिए होती है। इसकी प्राप्ति तब होती है जब मन के कलुष को दूर करने की चेष्टा की जाती है। हमें अपने सामाजिक परिवेश की भी चिंता  करनी है और बिगड़ते हुए पर्यावरण की भी। वास्तव में पर्यावरण को बचाकर ही हम देव दीपावली को ऋतु परिवर्तन के पर्व के रूप में मनाते रह सकते हैं।








 


 
था।

Friday, 20 November 2020

छठ व्रत और मां

भारत के त्योहारों की विशेषता यह है कि यह सामाजिक एवं पारिवारिक एकता  के अनुपम आदर्श है। इसी भाव के साथ प्राचीन काल से पर्व मनाते चले आ रहे हैं।
विशेषकर छठ पर्व परिवार और समाज के एकीकरण का  त्योहार है । हमारे परिवार में भी छठ पर्व धूमधाम से मनाया जाता था। मेरी मां ने पच्चीस से भी ज्यादा वर्षों तक छठ व्रत करती रही थी लेकिन गठिया जैसी बीमारी ने उन्हें आगे के वर्षों में व्रत रखने से वंचित कर दिया था। 
मां का कहना था कि यह पर्व जीवन को खुशहाल व रिश्तों को मजबूत बनाने में अटूट कड़ी  की भूमिका निभाता है। हमारे ददिहाल और ननिहाल दोनों तरफ के परिवार मिलजुल कर यह त्योहार मनाते थे ।
मां छठ के एक हफ्ते पहले से तैयारियां शुरू कर देती थीं। पापा के साथ व्रत से संबंधित सारी खरीदारियों खुद करती थीं।  नहाय खाए के दिन गंगा नदी जा कर पानी और मिट्टी लाती और उस कमरे को उनसे साफ करतीं । छठ के पहले दिन नहाय खाय में चावल दाल और लौकी की सब्जी मिट्टी की चूल्हे पर बनता था। उस खाना को प्रसाद के रुप में ग्रहण करना होता है । छठ पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। मां कमरे में जमीन पर सोया करती थीं। व्रत से संबंधित सारे काम नहाने धोने के बाद ही करना होता है।
परिवार की महिलाएं प्रसाद बनाती थीं एवं पुरुष मंडी से फल सब्जियां लाते थे। छठ का दूसरा दिन खरना का होता है। उस दिन खीर पूरी प्रसाद के रूप में चांद को देखने के बाद मिलता है। खर्णा वाले दिन हमारे मित्र एवं रिश्तेदार दूर दूर से प्रसाद खाने आते थे। कुल मिला कर यूं कहें कि माहौल उत्साह और उल्लास का होता था।जीवन को नई ताजगी मिलती थी जिससे जीने का हौसला दुगुना हो जाता था। 
तीसरे दिन शाम को सूर्य को अर्घ्य देने के बाद खाना पीना होता था। सभी भाई बहन के साथ हंसी मज़ाक होता था। पापा अपने भाइयों के साथ त्यौहार का आनंद लेते थे। उस रात मात्र दो तीन घंटे सोने के बाद सुबह के अर्घ्य की तैयारी शुरू होती थी। सुबह वाले अर्घ्य के बाद ठेकुआ प्रसाद में मिलता था। इसके साथ चार दिनों तक चलने वाले पवित्र , ऊर्जावान और उल्लास वाला त्योहार समाप्त होता था। 
आज मां हमारे बीच नहीं है लेकिन छठ जितने तन्मयता से करती थी उसे शायद ही कोई भूल पाएगा।
   बीते पलों को याद कर रहा हूं मां,
   कुछ लिखने में दिल लगा रहा हूं
   मगर सच तो यह है
   दिल नहीं लग रहा है तुम्हारे बिना मां !!

Saturday, 14 November 2020

Deepawali celebrates the light of Knowledge

Deepavali,  the festival of lights, is reach in symbolism. Celebrated on the darkest of nights, it indicates that for those who light the lamp of knowledge in the darkness of life , there is luminosity, both within and without. For those who don't, the mind abides in darkness because the outer light is temporary.
The festival of Deepawali starts from the dhanteras and is celebrated over five days culminating in the day of Bhaidooj. These are extremely potent days for manifestation and sidhhis.
Rituals associated with Diwali have deep spiritual significance. Before Deepawali people clean and decorate their homes and workplaces. On Deepawali night they light lamps in their homes and offer prayers invoking Lakshmi goddess of wealth. These practices are refualised expressions of rejuvenation of human soul in its journey through time.
The cleaning before Dipavali symbolises cleansing thar the soul must undergo to be able to receive and retain the wisdom and virtues that God gives. It is believed that Goddess Lakshmi does not enter homes that are not clean, and make sure that every corner of their dwelling is clean before Diwali. We should keep our mind pure. The cleaner the mind the more one is attracted to all that is good and noble, and such a mind seeks enlightenment. Happiness is the fruit of good actions, which in turn flow from pure thoughts and feelings. Noble thoughts will come
Deepawali in the true sense celebrates the rooting out darkness from the mind by lighting the lamp of dhyana jnana.