Sunday, 31 May 2020

बिहार का नवनर्माण _ नई उम्मीद नया संकल्प

करोना महामारी के कारण बिहार के श्रमिकों को बेहद परेशानी से गुज़रना पड़ा है । जिस तरह श्रमिकों को समस्या हुई है वह शायद ही इतिहास में हुआ होगा ।वैसे महामारी और पलायन में रिश्ता है । जब भी महामारी फैली है पलायन हुआ है।करोना महामारी ने हमें सीख दी है कि जो काम आप किसी छोटी जगह में रह कर कर सकते हैं उसके लिए महानगरों में भीड़ बढ़ाने की क्या ज़रूरत है। जो दिल्ली,मुंबई, पंजाब,,गुजरात आदि कभी नरम फुलों की तरह भाती थी मगर अब वह बबूल की काँटों की तरह चुभ रही है। जब तक उनसे काम लेना था ख़ूब लिया गया। यथाशक्ति शोषित भी किया गया और महासंकट की उस बेला में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया। ये श्रमिक या तो वापस नहीं जाएँगे या अगर उन्हें अपनी जगह पर फिर अवसर नहीं मिलता है कुछ महीने रुक कर जाएँगे। उनके कटु अनुभव उनके पाँव को जकड़ लेगा। वे अपने रोज़ी रोटी का विकल्प अपने गाँव और आस पास के जिलों के शहरों में ढूँढने की कोशिश करेंगे। बिहार सरकार की भी चाहिए कि उनके लिए वहीं रोज़गार की व्यवस्था करे।ताकि दूसरे राज्य में जा कर अपनी तौहीन नहीं कराना पड़े। कोविंद-19 ने हमें बहुत कुछ सीखाया ही नहीं बल्कि हमारी जीवन शैली को बदल दिया है। यह सदी का सबसे कठोर शिक्षक साबित हुआ है। बिहार सरकार एवं स्वयंसेवी संगठन इस बात को समझे और वहीं पर उद्योग धंधे खोलकर उन्हें बेहतर ज़िंदगी देने की कोशिश करे। अगर फिर से रोज़ी रोटी के लिए अन्य प्रदेशों का रूख करना पड़े तो राज्य का साधुवाद छीन जाएगा। मिसाल के तौर पर तमिलनाडु राज्य है। जब बाल ठाकरे ने तमिलीयन को मुंबई में तंग करना शुरू किया था तो तमिलनाडु सरकार ने अपने राज्य में ही उनके रोज़गार की व्यवस्था की जिससे तमिलनाडु राज्य आज आत्मनिर्भर और सम्पन्न राज्य की सूची में आता है। बिहार में लौट रहे श्रमिकों की हूनर से बदला जा सकता है बिहार के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन। सरकार को संवेदनशील बनना पड़ेगा।बिहार सरकार को इस बीमारी से सबक़ लेकर श्रमिकों के लिए बेहतर रोज़गार एवं व्यवस्था बनाने की पहल करना पड़ेगा।यह समय बिहार सरकार के लिए असाधारण कार्य करने का है। क्या बिहार के नवनिर्माण का मार्ग 89 लाख श्रमिकों के श्रम व कौशल के लगाए बिना सम्भव है ? कहीं यह समय नए बिहार के निर्माण तथा बिहारियों की सम्मान की रक्षा का आमंत्रण तो नहीं दे रहा है ? करोना महामारी और लॉकडाउन ने इतिहास के सामने सच्चाई उजागर कर दिया कि कभी बहारों का क्षेत्र कहे जाने वाला बिहार कितना बेबस और मजबूर है। जहाँ के पचास लाख से भी ज़्यादा लोग पेट पालने के लिए बिहार से दूसरे  में अपमान झेलते हुए अपने श्रम बेचने पर मजबूर हैं। जबकि बिहार में ही विकास किया जा सकता था।बिहार में बृहत् कृषि क्षेत्र है। गंगा तथा सैकड़ों नदियों के कारण जल संसाधन की कमी नहीं है। दक्ष श्रमिकों की भी कमी नहीं है। सब कुछ के उपलब्धता के बावजूद बिहार में औद्योगिकरण क्यों नहीं हुआ ? रोज़गार का सृजन क्यों नहीं हुआ ? आज़ादी के बाद बिहार दो भागों में बँटा था उत्तरी बिहार एवं दक्षिणी बिहार।चुकि दक्षिणी बिहार खनिज सम्पदा से भरा हुआ था इसलिए सारे उद्योग वहीं लगे जो बाद में झारखण्ड के नाम से अलग राज्य बना।लेकिन उत्तरी बिहार (आज का बिहार ) में पतन का दौर आज़ादी के बाद से ही रहा ।लेकिन सबसे बुरा दौर 1990-2005 का रहा।यह दौर वैश्वीकरण का दौर था। सारे राज्यों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ का प्रसार हो रहा था। राज्यों में उन्हें बुलाने के लिए प्रतिस्पर्धा थी। छोटे,मँझले, बड़े उद्योग लग रहे थे। उन राज्यों में ख़ूब निवेश किए गए।उसी दौर में सॉफ़्टवेयर की क्षेत्र में क्रांति आयी हुई थी। लेकिन इन सबसे अलग लालू-राबरी राज ने बिहार में जंगल राज बनाया हुआ था। चोरी.डकैती,लूट-पाट अपनी चरम सीमा पर थी। जातिवाद के नाम पर अगड़े-पिछड़े जाति कहते हुए लोगों को एक दूसरे से लड़ाया जा रहा था। भला ऐसी परिस्थिति में कैसे औद्योगिकरण या निवेश होता।एक भी उद्योग नहीं लगा। जो फ़ैक्टरी लगी भी थीं बंद हो गए। व्यापारी अपना व्यापार बंद कर दूसरे राज्य चले गए। जूट उद्योग , चीनी उद्योग , पेपर उद्योग ,साइकल फ़ैक्टरी आदि बंद होते चले गए। यहाँ तक कि छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करने दूसरे राज्य चले गए। दूसरा पंद्रह साल नीतीश सरकार का रहा जिन्होंने पंद्रह साल में क़ानून का राज तो स्थापित कर दिया लेकिन रोज़गार का अवसर पैदा करने में विफल रहे। अगर इन दोनो ने बिहार में औद्योगिकरण, तरक़्क़ी एवं रोज़गार की सृजन के बारे में सोचा होता तो आज जो स्थिति श्रमिकों की हुई ऐसी स्थिति कभी नहीं होती।करोना एक वरदान के रूप में आया जिसने बिहार के नेताओं की पोल खोल दिया। सभी सरकार केवल बिहार के गौरवशाली इतिहास पर इठलाती रही।
पिछले कुछ वर्षों से राजस्व सम्बंधी समझदारी आधारिक संरचना ( Infrasrtucure ) पर लक्ष्य आधारित ख़र्च और विकास की मिसाल बन कर बिहार ज़रूर उभरा है लेकिन ग़रीबी कम करने और पलायन रोकने के लिए सरकार को औद्योगिकरण और कृषि उत्पादकता में सुधार की ज़रूरत है।कुछ अरसे तक राज्य में उद्योग के नाम पर एकमात्र क्षेत्र निर्माण क्षेत्र ही रहा है।उद्योग धंधों को विकसित करने के लिए राज्य को लम्बा सफ़र तय करना होगा। राज्य में कृषि उपकरणों में और छोटे मशीन निर्माण,पर्यटन,सूचना,प्रौद्योगिकी ( IT ) खाद्य प्रसंस्करण और रेडीमेड वस्त्र निर्माण को प्राथमिकता देनी होगी।तत्काल इस क्षेत्र में निवेश की ज़रूरत है। जूट पूर्वोत्तर बिहार का एक प्रमुख कृषि उत्पाद होता था। जूट उत्पादन से सीमांचल में विकास व स्वरोज़गार के उद्देश्य से पूर्णिया में जूट पार्क लगाया गया था।कुछ दिनों से वह भी श्रम शोषण के कारण ठप्प पड़ा है उसे फिर से विकसित करने की ज़रूरत है। बिहार सरकार जूट एवं चीनी उद्योग को उबारने पर ध्यान दे जो बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन ;को प्रभावित करता है। तकनीक के दौर में आवश्यक है कि राज्य की आईटी आई विश्वस्तरीय बने। हमारे श्रमिक हूनर के साथ गाँव लौटे हैं।अनेक तरह से शहरी हूनर से लैस ये श्रमिक गाँव, जिले की तस्वीर बदल सकते हैं। ये युवा पीढ़ी दूसरे राज्य से लौट कर जाति और धर्म की संकीर्णता से ऊपर उठकर सामाजिक तानाबाना भी बनेंगे। घरेलू महिलायें भी दक्ष हो गयी होंगी। स्वरोज़गार के हूनर भी सामने आएँगे। ज़रूरत है कि सरकारी ख़ज़ाने से या बैंक से उन्हें सहायता दी जाए ।बिहार सरकार को दूरदर्शितापूर्ण योजना बनाकर अमल करना चाहिए।इससे गाँव और जिलों कि अर्थ व्यवस्था वापस लौटेगी। चुना ,ईंट, सिमेंट, लोहा,वेल्डिंग,लकड़ी आदि तरह तरह के रोज़गार एवं छोटे, बड़े व्यापार फलेंगे फूलेंगे। बिहार की जनता के प्रति केंद्र सरकार का भी दायित्व बनता है। क्योंकि दूसरे राज्य अमीर होते गए और बिहार ग़रीब होते गया। बदलाव का यह समय हस्तकौशल परम्पराओं का पुनरुद्वार कर ख़ाली होने जा रहे हाँथों का कूदतरत और माटी से दोबारा जोड़ने का है ताकि ख़ाली दिमाग़ कुछ सुंदर नया रचे। समय की माँग है कि बिहार में उद्दमशीलता की प्रक्रिया वास्तविक रूप से आसान बनाया जाए। नेता और जनता जातिवाद से ऊपर उठकर बिहार में औद्योगिक क्रांति में अपना योगदान दें।इन्स्पेक्टर राज से पूरी तरह मुक्ति पानी होगी। ज़मीन ख़रीदने और बेचने की प्रक्रिया को आसान बनाने की ज़रूरत है। कलेयर लैंड टाइटल से उद्दमशीलता को बढ़ावा मिलेगा।रोज़गार सृजन को बढ़ावा देने के लिए निवेश लाने के लिए प्रयास करना होगा।सरकार को बुनियादी ढाँचा क्षेत्र में निवेश के लिए अपने ख़ज़ाने का मुँह खोलना होगा। केंद्र सरकार द्वारा अच्छी फ़ंडिंग के कारण बिहार सरकार के पास पैसे की कमी नहीं होनी चाहिए। अगर नहीं भी है निवेश करने के लिए अपने ख़ज़ाने का मुँह खोलना होगा। यह इसलिए ज़रूरी है ताकि इस निवेश असर तुरंत महसूस हो और तात्कालिक संकट पर क़ाबू पाया जा सके। अगर सरकार श्रमिकों को अपने गाँव एवं जिले में रोज़गार देने में सफल होती है तो जनता का  आधुनिक बिहाार  का सपना पूरा होगा और श्रमिक अपने दर्द को भूल पाएँगे। बिहार की जनता को आज सोचने की ज़रूरत है कि बिहार से लोग दूसरे राज्य में जाते हैं लेकिन दूसरे राज्य से लोग बिहार नहीं आते। क्यों ? कौन थे और कौन हैं इसके ज़िम्मेवार ? इसके ज़िम्मेवार नेता के साथ जनता भी रही। जनता जातिवाद में बँटी रही और नेता इसका फ़ायदा उठाते रहे। सोशल इंजनीरिंग के नाम पर लड़ाते रहे। अब परिवर्तन की ज़रूरत है। अब शासक से सवाल पूछने का समय है। शांतिपूर्ण आंदोलन की ज़रूरत है। बिहार की जनता को इस बार उम्मीद है कि बिहार में उद्योग लगेंगे । इसके लिए लेना होगा दृढ़ संकल्प । हम एक नया बिहार ज़रूर बनाएँगे।
फोटो : गूगल

Saturday, 23 May 2020

गंगा ने बचाया लॉक डाउन के दौरान देश के अरबों रुपए

लॉक डाउन ने अगर  मानव एवं अर्थव्यवस्था को एक तरफ़ क्षत-विक्षत किया तो दूसरी तरफ़ पर्यावरण हवा, नदी,एवं आसमान में एक बड़ा बदलाव किया है। यह एक वरदान के रूप में आया है।
लॉक डाउन के दौरान अविरल और निर्मल बहती जीवनदायिनी गंगा ने क़रीब 50 वर्ष बाद रूप बदल लिया।कल कल करते हुए गंगा की आवाज़ सिर्फ़ अविरल धारा का बहाव नहीं यह पतित पावनी की दिल की आवाज़ भी है। गंगा की शोर मे  उसकी मुस्कान महसूस होता है।
जिस गंगा को अरबों रुपये ख़र्च करके सरकारों ने निर्मल नहीं कर पायी वही गंगा गोमुख से बंगाल की खाड़ी तक इस लॉक डाउन  मे ख़ुद से साफ़ कर लिया।गंगा ने देश के अरबों रुपये बचा लिए।हमने गंगा के आँचल को इन पचास वर्षों मे बहुत गंदा किया।सामाजिक संस्थाएँ,सरकारें,वैज्ञानिकों द्वारा जिस गंगा के जल को पीने योग्य नहीं बनाया जा सका उस गंगा का जल लौकडाउन के दौरान पीने हो गया।इसके पानी में 500% TDS की कमी आयी है।आज इसकी TDS की वैल्यू 72 है जो सामान्यतः घरों में पीने के लिए इस्तेमाल करते हैं । जिस गंगा के जल को B category में रखा गया था अब वह A category में आ गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि अब गंगा के जल को dysinfect कर पीने के योग्य हो सकता है।

उत्तराखण्ड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक़ गंगा का जल अब दशकों बाद chlorification के बाद पीया जा सकता है।हर की पौड़ी एवं ऋषिकेश से लिए गए जल के sample से यह साबित हुआ है। पानी का PH balance 6.5-8.5 के बीच है।PH balance से ही पानी में acid की जाँच होती है।वैज्ञानिकों ने भी माना है कि लोगों की ग़ैर मौजूदगी एवं फ़ैक्टरी बंद होने से प्रदूषण अब गंगा में नहीं होता जिसके कारण यह बड़ा परिवर्तन सम्भव हुआ है।

गंगा के निर्मल निश्छल नीला रंग अब पीने योग्य हो गया है। जिस गंगा जल को पूजा जाता है उसे दूषित कोई नहीं बल्कि हम इंसानों ने किया है।जब लॉक डाउन है, फ़ैक्टरी बंद पड़े हैं और घाटों पर किसी को जाने की इज़्ज़ाजत नहीं है गंगा ने स्वयं को स्वच्छ कर लिया।गंगा अपने ही जल में साँस ले रही है क्योंकि उसमें oxygen की मात्रा बढ़ी है।
गंगा उत्तराखण्ड से बंगाल की खाड़ी तक की दूरी लगभग 2500 km तय करती है जिसमें 29 बड़े शहर, 23 छोटे शहर और 48 क़स्बे आते हैं जिन्हें पोषण करती है। लेकिन दू:ख है कि इसमें लगभग 1000 फ़ैक्टरी का कचड़ा और शहरों के गंदी नालों का पानी गिराए जाते हैं। रासायनिक कारख़ानों का कचड़ा गंगा मेन बहाए गए। कानपुर के चर्म उद्योग ने भी गंगा को प्रदूषित किया। औद्योगिक विकास हमारी उन्नति,प्रगति,और समृद्धि के लिए आवश्यक है इसलिए औद्योगिक इकाइयों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती गयी किन्तू इन इकाइयों की गंध, तेज़ाब,गंधक,कौस्टिक सोडा आदि के निस्तारण का समुचित प्रबंध नहीं होने से उसे गंगा नदी में बहा दिया जाता है।शहरों में घनी आबादी वाले क्षेत्रों में मल-मूत्र को बिना उपचार किए नदी में बहाए गए। तीर्थ स्थलों पर लाखों लीटर मैले गंदगी गंगा मे बहाते रहे। गंगा के तटों पर लाखों शवों का दाह किया जाता है। इसके लिए लाखों टन लकड़ियों की ज़रूरत होती है जिसके जलने से लाखों टन राख जमा हो जाती है। इन सब से जल का प्रदूषण स्तर बढ़ जाता है।
गंगा के स्रोतों के पर्यावरणप्रदूषण के विषय पर योजनाएँ बनीं।प्रदूषण को रोकने के लिए कुछ कार्यवाही भी हुई। जल की शुद्धता बनाए रखने के लिए कुछ कार्यवाही भी हुई। जल की शुद्धता बनाए रखने के लिए प्रदूषण निरोधक जाल भी बिछाया गया जिसे Enviornmental Monitoring System कहा जाता है।Central pollution board ने प्रदूषण को रोकने के लिए अनेक उपाय किए। केंद्रीय गंगा संस्थान प्राधिकरण 1985 में स्थापित किया गया। उसका मुख्य उद्देश्य गंगा नदी को प्रदूषण से मुक्त करना था। राष्ट्रीय स्तर पर अनेक विश्वविद्यालय एवं प्रयोगशाला में इसपर अध्ययन एवं शोध हुए।राष्ट्रीय सेवा योजना, नेहरु युवक केंद्र ने भी काम किए। लेकिन परिणाम संतोष जनक नहीं रहा। स्वयं सेवी संगठनों ने भी काफ़ी काम किए। उनके द्वारा धरने एवं जुलूस निकाले गए , सरकारों को सुझाव दिए गए । यही नहीं स्वयं सेवी जी डी अग्रवाल जी ने तो अपनी जान दे दी उनके बाद बिहार की पद्मावती अनशन पर बैठी लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी। पर्यावरणविद श्री ज्ञानेंद्र रावत जी वर्षों से दशकों से इस पर अपनी राय एवं सुझाव देते रहे लेकिन नीति निर्धारकों ने नहीं सुनी। नई सरकार ने थोड़ी पहल की जैसे नया मन्त्रालय “ जल शक्ति मन्त्रालय “ बनाया  एवं “ नमामि गंगे प्रोजेक्ट “ शुरू किया। लेकिन इनके परिणाम को लेकर कुछ भी बताना जल्दबाज़ी होगी।
इस धारणा से शायद ही कोई असहमत हो कि गंगा सिर्फ़ आस्था नहीं अर्तव्यवस्था भी है। यद्यपि विडम्बना है कि प्रकृति द्वारा नदी  की शक्ल में प्रदत्त इस जीवनधारा के महत्व को हम याद याद नहीं रख पाए और उसे स्वार्थ बेपरवाही एवं अदूरदर्शिता का शिकार बनाया।
गंगा का सर्वाधिक नुक़सान औद्योगिक इकाइयों की संकीर्ण सोच और नगर निकायों की ग़ैरज़िम्मेदार कार्यशैली ने पहुँचाया है।सरकारों ने गंगा प्रदूषणमुक्त करने के नाम पर खरबों रुपये पानी में बहाए। काग़ज़ी क़वायद की आड़ में घोटालों के चलते वक़्त के साथ गंगा की हालत बदतर होती गयी। फिर भी लोग नदियों में सीवर की पानी पूजन सामग्री प्रवाहित करने की धृष्टता से बाज़ नहीं आते।जीवन एवं मोक्षदायिनी का जल ज़हर बन चुका था । उसे जल्दी ही अमृत नहीं बनाया जाता तो यह ज़हर किसी को भी नहीं बख़्शता ।
हमारे प्राचीन शस्त्रों ने मात्र तीन शब्दों में नदियों के अस्तित्व की सुरक्षा का मूलमंत्र दिया था- “ नदी वेगेन शुद्ध्यति “ अर्थात नदी अपने जल के वेग से शुद्ध होती रहती है।उसके प्रवाह को अवरुद्ध नहीं किया जाए तो वह कभी प्रदूषित नहीं होती।सब कुछ अपने प्रवाह में बहा कर ले जाती है और अनंत सागर को सौंप आती है। उसकी सफ़ाई के लिए विदेशों से या विश्व बैंक से ऋण लेने की आवश्यकता नहीं। देश के करोड़ों का बजट गंगा या अन्य नदियों पर नहीं ख़र्च होकर देश के अन्य समस्याओं जैसे युवाओं के लिए रोज़गार सैनिकों के लिए सुविधा शिक्षा की गुणवत्ता आदि पर ख़र्च हो सकता है। बस नदियों को अविरल बहने दें।
हमारा मानना है कि गंगा के नाम पर करोड़ों रुपये का बजट का नहीं बल्कि लोगों को गंगा से दूर रखना एवं फैकट्रीयों को बंद रखने की ज़रूरत है। लोगों को डर है कि अगर लॉक डाउन हटा तो गंगा कहीं पहले जैसी नहीं हो जाये।

Wednesday, 6 May 2020

मजदूर संकट --: चुनौतियां के बीच संभावनाएं

मज़दूर संकट -चुनौतियाँ के बीच संभावनाएं

करोना महामारी के बाद पलायन लाज़मी था। पहले भी जब कही भी महामारी फैली है पलायन हुआ है। लेकिन लॉकडाउन  के कारण ये पलायन पहले से भिन्न है। वर्तमान में अनिश्चित्ता बनी हुई है। अर्थव्यवस्था की हालत भी ठीक नहीं है।इस कारण सभी को मज़दूरों पर सोचने के लिए विवश किया।
ये मज़दूर कौन हैं। पहले यह समझ लें।
आम दृष्टि में मज़दूर शारीरिक श्रम करने वाले माने जाते हैं।जबकि मौजूदा विश्व के संदर्भ में यह अर्थ अधूरा है।न केवल शारीरिक श्रम करने वाले मज़दूर होते हैं बल्कि वह सभी लोग मज़दूर हैं जो काम के एवज़ में वेतन पाते हैं।लेकिन आम तौर पर लोग यह मानते हैं कि जो मिल या खेतों में काम करते हैं वही मज़दूर होते हैं। 
ग़रीब राज्य से काम की तलाश में ये मज़दूर हज़ारों मील दूसरे राज्य में जाते हैं और अपने हूनर से उस उस राज्य के विकास में अपनी भूमिका निभाते हैं।लेकिन कभी भी इन मज़दूरों के विषय में गम्भीरता से नहीं सोचा गया।आज करोना वायरस ने सब उधेड़ कर रख दिया है।शारीरिक श्रम करने वाले मज़दूरों के लिए कौन है ? मज़दूर भूखे प्यासे हज़ारों मील पैदल यात्रा कर गाँव जाने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उनकी बचत और रोज़गार दोनो चले गए।
प्रवासी मज़दूर एक बार गाँव पहुँच गए तो शायद करोना का क़हर ख़त्म होने के बाद वापस शहर का रूख न करें।क़रीब पाँच करोड़ से ज़्यादा प्रवासी मज़दूर गाँव वापस जा चुके हैं।अब समस्या यह होगी कि जहाँ वे लौट कर गए हैं वहाँ तो रोज़गार है नहीं। अब सारा बोझ कृषि पर जाएगा। इसलिए स्थायी समाधान निकालना बहुत आवश्यक है। इसका समाधान यही है कि ग्रामीण इलाक़ों में कृषि आधारित छोटे छोटे उद्योग लगाए जाएँ । ग़रीब राज्यों में लौट रहे प्रवासी मज़दूरों के  हुनर से बदलने होंगे गाँवों की सामाजिक,आर्थिक,और राजनीति जीवन।सरकार को संवेदनशील होना पड़ेगा।लौट रहे प्रवासी मज़दूर अपने हूनर से गाँव की तस्वीर बदल सकते हैं यदि सरकार संवेदनशील हों।निर्माण श्रमिक अब राज मिस्त्री का काम करेंगे,प्लम्बिंग,मोबाइल मरम्मत,बिजली मरम्मत दर्ज़ी एवं नाई,सलून आदि अनेक तरह के शहरी हूनर से लैस ये प्रवासी हूनरमंद गाँवों की तस्वीर बदल सकते हैं।युवा पीढ़ी शहर गाँव में आ कर जाति और धर्म की संकीर्णता से ऊपर उठकर सामाजिक तानाबाना भी बदलेंगे और समाज समावेशी होगा।घरेलू कामकाजी महिलाओं की स्वरोज़गार के हूनर भी सामने आएँगे।ज़रूरत है कि सरकारी ख़ज़ाने द्वारा बैंकों से उन्हें सहायता दी जाए।केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को दूरदर्शिता पूर्ण योजना बनाकर अमल करना चाहिए।आने वाले समय में रचनात्मकता और मानवीय संवेदना का कोई विकल्प नहीं है।सरकार को भी मज़दूरों के कौशल पर ध्यान देना होगा और रोज़गार के नए नए अवसर तलाशने होंगे।
एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि मज़दूरों के लिए आज तक जो भी योजनाएँ बनी हैं वे तीन तरह की हैं - पेन्शन, मेडिकल बीमा मृत्यु या विकलांगताकी स्थिति में मुआवज़ा।लॉकडाउन या आर्थिक मंदी जैसे संकट की स्थिति का मुक़ाबला करने के लिए एक भी योजना नहीं है।सरकार को जल्द कोई योजना बनाना चाहिए।
संकट संभलने का अवसर देता है। “जब जागे तभी सवेरा “।यह अवसर है सम्भलने का।सभी को मज़दूरों के विषय में सोचने की ज़रूरत है।ये मज़दूर समाज को कुछ देते ही है लेते कुछ भी नहीं है।मज़दूरों के लिए संवेदनशील संगठन को बाहर से आने वाले मज़दूरों के हूनर का प्रोफ़ाइल बनाकर उनके लिए पुनर्वास कार्य योजना तैयार करना चाहिए।
* तस्वीर गूगल

Saturday, 25 April 2020

संकट के समय बैंक और बैंक कर्मी हमेशा देश के साथ !!

करोना वायरस के इस वैश्विक संकट के दौर में जब दुनिया एक अदृश्य दुश्मन से लड़ रही है। ऐसे में देशवासियों की सुरक्षा के लिए के स्वास्थ्यकर्मी, पुलिसकर्मी, सफ़ाईकर्मी और मीडिया कर्मी प्रथम पंक्ति में मुकाबला कर ही रहे है, पर देश में कुछ और भी लोग है जो इस मुश्किल घड़ी में बिना शोर किये देश सेवा में कृत संकल्पित है और सजग प्रहरी के रूप में अपनी सेवाओं के माध्यम से 130 करोड़ देशवासियों की सेवा कर रहा है। ये कोई और नही आपके बैंककर्मी है। जो लगातार जनता के साथ सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करते हुए बैंकिंग सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं। 

करोना महामारी को ध्यान में रखते हुए जनता को पूर्ण सहयोग कर रहे हैं जिससे उन्हें बैंकिंग सेवाओं सम्बंधित किसी भी प्रकार की समस्या नहीं हो।

इस वैश्विक महामारी के संकट भरे दौर में बैंक कर्मी अपनी सेवा के माध्यम से करोड़ो लोगों का दिल जीत रहे है। संकट के इस दौर में सबसे निचले तबके के लोगों को सरकार की ओर से जन धन खातों से मिली राहत को समय पर बैंक कर्मी उनतक पहुंचा रहे है। साथ ही वरीय नागरिकों, पेंशनर और अन्य लोगों को पैसे सही समय पर मिले इसके लिए प्रयत्नशील है।

बैंकिंग सुविधाएँ उपलब्ध कराना विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में हमेशा से चुनौती रही है।सरकारी बैंक ग्रामीण क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण अंग के रूप कार्य कर रही है। बैंक ग्रामीण भारत और शहरी भारत के आर्थिक स्थिति के अंतर को कम करने का प्रयास कर रही है।जिस गाँव में स्थिति बहुत ख़राब होती है वहाँ भी इनका प्रयास अच्छी से अच्छी सेवा देना होता है। इसके अतिरिक्त सरकारी अनुदान और सामाजिक सुरक्षा लाभ को लाभार्थी के खाते में प्रत्यक्ष रूप से पहुँचाया जाता है जिससे वह अपने ही गाँव में भुगतान प्राप्त कर सके।किसानों को कम दर पर ऋण उपलब्ध कराते हैं जिससे किसान साहूकार के शोषण से दूर रहें। सरकार इसके लिए दायित्वों और समझदारी के साथ पूरा करने का दवाब भी डालती है। 

बावजूद इतनी कर्मठता के सरकार किसी की भी आए लेकिन बैंककर्मियों के प्रति सहानुभूति नहीं होती। नेताओं के शह पर बड़े बड़े उद्योगपति जानबूझकर बैंक की रक़म नहीं चुकाते जिससे एन पी ए खातों से काफ़ी नुक़सान होता है। सरकारों की ज़िम्मेदारी बनती है कि ऐसे लोगों पर रिपोर्ट दर्ज कर उनसे वसूली की कारवाई करे लेकिन इसके उलट  बैंककर्मी पर ही कारवाई होती है।   कर्मचारियों पर काम के अत्याधिक बोझ होने से स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है। 

विमुद्रीकरण अभियान ( Demonitization ) में बैंककर्मीयों की अहम भूमिका थी जिन्होंने रात दिन एक कर के देश और देशवासियों की सेवा की थी। ये अलग बात है कि कुछ खादीधारियों के कारण भ्रष्टचार मुक्त सुविधा के इस महा अभियान में भी उन्हें बदनामी हाथ लगी। जनधन खाते खुलवाने में लम्बी लगी क़तारें को उन्होंने बख़ूबी सम्भाला। जो आज सरकार के लिए जरूरतमंद लोगों तक सहायता राशि सीधे पहुंचाने में सहायक सिद्ध हुई है। 

आए दिन लोग बैंककर्मी की शिकायत करते हैं। जिससे उनके काम पड़ असर पड़ता है। जाली नोट मिलने से उन्हें अपने पास से भुगतान करना पड़ता है जिससे उन्हें नुक़सान होता है। कभी कभी ग्राहक कम नोट देकर चले जाते हैं इसका भी भुगतान उन्हे ही करना पड़ता है।

एक जमाने में बैंक कर्मी की तूती बोलती थी। बैंक की नौकरी सम्मानजनक मानी जाती थी। लेकिन कुछ वर्षों से हाशिए पर चले गए। बैंकिंग उद्योग का वर्तमान परिवेश दिनों दिन चुनौती पूर्ण होता जा रहा है। देश की अर्थवयवस्था में मंदी आने से गुणवत्ता की चुनौतियां बनी हुई है।बैंकों का विलय हो चुका है जिसका परिणाम कुछ वर्षों बाद ही मालूम पड़ेगा।

इस चुनौतीपूर्ण परिवेश में ये ग्राहक सेवा को उन्नत स्तर पर के जाने की कोशिश कर रहे हैं। बैंक को इस  संकट में सिर्फ़ उनके वेंडर ही मदद करते हैं। 

माइक्रोकाउंट्स की पूरी टीम  नोट गिनने की मशीन और नोट सॉर्टिंग मशीन की देखरेख में लगे रहते हैं जिससे बैंक का काम नहीं रुके। इसी प्रकार ए टी एम वेंडर भी सेवाएँ दे रहें हैं।

सरकार बैंक कर्मियों व अधिकारियों की मांगों पर सहानुभूति पूर्वक विचार करें। ग्राहकों को भी  सहयोग करना चाहिए। बैंक के उच्च अधिकारियों को भी अपने शाखाओं को वह सारी  टेक्नोलॉजी मुहैया कराना चाहिए जिससे उनका काम आसान हो। 
प्रधान मंत्री के 5 Trillion economy के सपनों को साकार करने में हमारे बैंककर्मी का economy soldiers के रूप में बहुत बड़ी भूमिका होगी।
Salute to bankers !!

Wednesday, 22 April 2020

पृथ्वी दिवस ( Earth Day ) के अवसर पर पर्यावरण को बचाने का संकल्प लें।

 हर साल 22 April को दुनिया में 193 देशों मे पृथ्वी दिवस के रूप में मनाया जाता है जिसकी शुुुुरुआत 1970 में  अमेरिका में हुआ था। मगर  इस वर्ष खास बात है कि इस वर्ष इसकी पचासवीं वर्षगांठ है। दूसरी खास बात है कि  इस वर्ष पूूरी दुनिया में वैश्विक महामारी फैली हुई है ऐसे में पर्यावरण में हमारी गलतियों से हुई बदलाव से सभी  अचंभित है।  प्रदूषण के स्तर में गिरावट और वायु की स्वच्छता को देखते हुए हमे समझना चाहिए कि मानव ने किस हद तक प्राकृतिक संतुलन को हानि पहुंचाया है।
महामारी के प्रसार को रोकने के लिए लागू किए गए लॉक डाउन से प्रकृति को भी फायदा हुआ है।जैसे गंगा में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी एवं यमुना के पानी में भी थोड़ा सुधार हुआ है। हवा सांस लेने के लायक हुई। ओजोन परत में सुधार हुआ। पृथ्वी के कम्पन में भी कमी आईं है।

लोग विकास की धुन में लगे हुए थे किन्तु विकास एवं  विनाश समानांतर रूप से होता है फिर ऐसा विकास क्यों और किसके लिए ? अपनी भावी पीढ़ी को विरासत में क्या देंगे जब पर्यावरण बचेगा ही नहीं ।अतः मानव को विवेक एवं बुद्धि से सचेत होकर विनाश रहित विकास करना चाहिए अन्यथा विकास की कीमत विश्व के विनाश से चुकानी पड़ेगी।


सर्वोदय दर्शन का मूलमंत्र है " सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यं तू मा कश्चित दूखभाग भवेत्"। तात्पर्य है कि सभी जनसमुदाय सुखी रहें, सभी निरोग रहें, सभी पारस्परिक कल्याण का प्रयास करें तथा किसी को किसी प्रकार का दूख न हो। यदि हम सर्वोदय दर्शन के इस प्रमुख अवधारणा को भारतीय परिवेश में क्रियान्वित करने का काम करें तो हमें सबसे पहले पर्यावरणीय प्रदूषण से विमुक्त होने का प्रयास करना पड़ेगा।
प्रकृति ने मानव को अन्य जीवों की अपेक्षा एक विलक्षण वस्तु " मस्तिष्क" प्रदान किया है जिसका दुरुपयोग किया गया।उसने अपने जैविक और भौतिकवाद के चक्कर में पड़कर एवं स्वार्थ में पड़कर प्रकृति और पर्यावरण संकलन को क्षत विक्षत कर दिया। विज्ञान की निरंतर भाग दौड़ तथा मानव द्वारा भौतिकवाद प्राकृतिक संसाधनों को तीव्रता से नष्ट किया जा रहा है। हमारा भरा पूरा संसार प्रदूषण के मायाजाल में फंसकर विनाश की ओर जा रहा है।हमे उससे मुक्ति पाना असम्भव तो नहीं है यह हमे करोना के कारण लॉक डाउन ने सीखा दिया।प्रदूषण की लपेट में धरती, आकाश,जल एवं वायु आ चुका है।इस चुनौती को सामना करने के लिए हमे तुरंत प्रभावी कदम उठाने होंगे।भविष्य में संसाधन और पर्यावरण संतुलन आदि सब खत्म हो जाएंगे तो हम हम भावी पीढ़ी को क्या देंगे।
लोगों को उपभोक्तावादी जीवन शैली को बदलने और विकास की अवधारणाओं को पुनर्विचार करने की जरूरत है। पर्यावरण के अनुकूल नीति अपना कर ही हमारा भविष्य प्रकृति सम्मत विकास पर निर्भर करेगा। ज़रूरी है कि हम ग्रीन बिल्डिंग, प्रदूषण मुक्त स्वच्छ टेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रिक वाहन की ओर अग्रसर हो।
करोना वायरस महामारी के बाद हमे अपने विकास और आर्थिक नीतियों की नए सिरे से दोबारा समीक्षा करना चाहिए।
सभी लोग संकल्प के साथ धरती को बचाने के लिए आगे आएं और मिलजुल कर इसे खूबसूरत बनाएं ।



Monday, 13 April 2020

कुछ सीखा कर ये दौर गुजर जाएगा, फिर हर इंसान मुस्कुराएगा.........

करोना वायरस की वजह से पूरे देश में लॉक डाउन हो गया है, औद्योगिक गतिविधियां ठप्प हो गईं हैं।सड़कों पर गाडियां नहीं दौड़ रहीं हैं। भवन निर्माण बंद है।इस वजह से पर्यावरण को लाभ मिला है। पृथ्वी पर हमारी रक्षा कर रही ओजोन परत को प्रदूषण से नुकसान पहुंच रहा था उसमे भी कमी आने से ओजोन परत में सुधार दिख रहा है।एक शोध के अनुसार जो रासायनिक तत्व ओजोन परत के नुकसान में जिम्मेदार थी उसके उत्सर्जन में कमी होने के कारण यह सुधार हो रहा है। इसी ओजोन परत से निकली पराबैगनी किरण से कैंसर जैसी बीमारी होती है।
सार्वजनिक और निजी यातायात बंद होने से वाहनों से निकलने वाला कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में काम हो गया है।ऐसे में प्रदूषण का स्तर खास कर महानगरों में दिखना शुरू हो गया है। गंगा यमुना का जल स्वच्छ हो गया है।गंगा के स्वच्छ होने का कारण ५००% टी डी एस की कमी बताया जा रहा है। आसमान नीला दिखना शुरू हो गया है। हवा में ताजगी महसूस हो रहा है। अब लोगों को महसूस हो रहा है कि प्रकृति से कितनी छेड़ छाड़ की गई है।हमें प्रकृति से क्षमा मांगना चाहिए।हमने प्रकृति कि मर्म को नहीं समझा।लालच, दंभ, अज्ञानता से विनाश करते गए।
जो करोड़ों खर्च कर के भी नहीं किया जा सका वह एक वायरस एवं लॉक डाउन ने पर्यावरण को स्वच्छ कर दिया।यह कोई चमत्कार नहीं है।यह सिर्फ दर्शाता है कि हमने प्रकृति को बचाने के लिए कुछ नहीं किया। हमने सिर्फ पैसे एवं जुबानी खर्च किए ।
देश में लॉक डाउन के दौरान प्रदूषण की गिरावट एवं नदियों कि स्वच्छता एवं निर्मलता ने लोगों का ध्यान खींचना शुरू किया है। आशा है कि लॉक डाउन की अवधि और बढ़ने से वायु एवं नदियों में प्रदूषण और भी कम हो सकता है। यह एक तथ्य है कि पिछले कई वर्षों से देश के कई अन्य शहरों में वायु एवं नदियों के जल की गुणवत्ता में लगातार गिरावट आती जा रही है। यह एक स्थाई समस्या बन चुकी है। प्रदूषण की जिम्मेदारी किसी एक संस्था या व्यक्ति की नहीं है बल्कि पूरे समाज की है। हम सिर्फ सरकार के भरोसे  रहते हैं। अपनी जिम्मेदारी से भागते हैं।
यह सही है कि नदियों कि सफाई एवं प्रदूषण सम्बंधित नीति निर्माण सरकार का काम है। क्योंकि ऐसे विस्तृत और बहुआयामी कार्य को संभालना किसी व्यक्ति या समूह की बात नहीं है। चुकी इसमें गंगा के उदगम से लेकर समुद्र में समाहित होने तक की व्यापक कार्य योजना की जरूरत होती है और केंद्र एवं राज्य सरकारे मिलकर यह कार्यान्वित करते हैं इसलिए किसी व्यक्ति विशेष या समूह यह कार्य नहीं कर सकते। फैक्ट्रियों का नदियों के पास से हस्तांतरण,सीवेज को नदियों मै गिरने से रोकना,फैक्ट्रियों के निकलती धुएं को प्रदूषण रहित कराना इत्यादि सरकार का काम है।लेकिन क्या नागरिकों को अपने देश के प्रति और अपने प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है ? लेकिन नागरिकों में सबकुछ सरकार के भरोसे छोड़ने की मानसिकता बन गई है।
करोना से बीमारी बढ़ रही थी इसलिए सरकार एवं नागरिक तुरंत सचेत हो गए एवं सरकार द्वारा लॉक डाउन जैसे उपाय किए गए और जनता डर से सरकार के सुझाव को मानने पर विवश हुई। किन्तु दूषित पर्यावरण एवं  नदियों ने तुरंत सेहत पर असर नहीं डालते इसलिए सरकार एवं नागरिक गंभीरता से नहीं लेते। जबकि इस वजह से कैंसर एवं फ्लोरोसिस जैसी बीमारियां बढ़ रही है। सरकारों को आधे अधूरे उपाय से बचना चाहिए जिससे उनकी इच्छा शक्ति की कमी को प्रकट करे।राज्य सरकार एवं केन्द्र सरकार को यह समझने की सख्त जरूरत है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए उनकी ओर से बहुत कुछ किया जाना शेष है।सरकार एवं नागरिक को प्रदूषण को रोकने के लिए अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी। ये भी सच है कि सरकार की ज्यादा सक्रियता के कारण नागरिक अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हटने लगते हैं।ज्यादातर नागरिकों को देश के पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी का तनिक भी एहसास नहीं है ।पर्यावरण बचाओ के नारे तो अनेक लोग लगाते हैं,खास मौकों पर रस्म अदायगी भी करते हैं लेकिन कुछ लोग ही होते हैं जो बिना दिखावे के अपनी जिम्मेदारी निभाते रहते हैं।हर नागरिक को वृक्ष लगाने की आश्यकता है।लोगों को निजी वाहन उतरकर बस एवं मेट्रो का रुख करना होगा।सरकार को भी हर व्यक्ति तक शहर के हर हिस्से में सार्वजनिक परिवहन की सुविधा उपलब्ध करानी होगी।पर्यटकों को पहाड़ों एवं समुद्र किनारे कचड़े नहीं फैलाना चाहिए।प्लास्टिक एवं पॉलीथिन का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करना चाहिए।पॉलीथिन और प्लास्टिक समुद्र एवं मिट्ट में जाकर पर्यावरण को विनाश कर रहा है। हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि धरती के पर्यावरण को अब हम प्रदूषित नहीं करेंगे।
वास्तव में यह बुनियादी बात सभी को समझना ही होगा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार का काम नहीं है इसमें हर व्यक्ति का योगदान चाहिए।
' कुछ सीखाकर ये दौर गुजर जाएगा ,फिर हर इंसान मुस्कुराएगा.........'

Wednesday, 8 April 2020

पानी का व्यावसायीकरण

पानी का व्यावसायीकरण और निजीकरण 
———————————————-
दिल्ली मेट्रो स्टेशन के बाहर वॉटर डिस्पेंसर लग रहे हैं।एक छोटे से गिलास में १रु में पानी बेचा जा रहा है।सोचने पर मज़बूर हुआ कि पानी कैसे बिक सकता है।अगर इसी तरह पानी बिकना आरम्भ होता है तो ये ग़रीब इंसान ,पशु-पक्षी , पेड़ - पौधे कैसे पानी ख़रीद पाएँगे ? देश की सरकारों ने जिस प्रकार सरकारी  विद्यालय,अस्पताल कॉलेज को धीरे धीरे ख़त्म के कगार पर ला दिया उसी प्रकार हवा,पानी आदि प्राकृतिक संसाधनों को भी उस अवस्था में न ले आए ।एक योजनाबद्ध तरीक़े से सभी सार्वजनिक स्थानों से प्याऊ,नल, हैंडपम्प,आदि हटा दिए गए।ऐसा क्या हुआ की पिछले १०-१५ वर्षों से पानी का बिकना आरम्भ हो गया। सरकारों ने पानी बेचना शुरू कर दिया जैसे रेल नीर आदि।
हमारे सविंधान के “आर्टिकल २१ - जीवन के अधिकार “ से भी यह स्पष्ट होता है कि सरकार को शुद्ध पानी की व्यवस्था करना चाहिए।कोई भी जनकल्याणकारी सरकार देश के नागरिकों को उनकी मूलभूत आवश्यकताएँ उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।
अब तो पानी के व्यवसायिकरण के साथ साथ निजीकरण की सरकारी मुहिम अचानक जोड़ पकड़ने लगी है।बिजली की निजीकरण का फल लोग भुगत रहे हैं।पावर सप्लाई के तर्ज़ पर वॉटर सप्लाई की निजीकरण का शोर है।जहाँ पर पानी की कमी है वहाँ हफ़्ते में वॉटर सप्लाई के ज़रिए पानी दिया जाता है।ऐसे में प्राईवेट लोग मनमानी करते हैं।लगभग १०,००० करोड़ डॉलर का पानी का वैश्विक कारोबार है।भारत बोतल बंद पानी का दसवाँ बड़ा उपभोक्ता है।जल के व्यावसायिकरण से ग़रीब और कमज़ोर लोग जो इसके लिए उतना मूल्य देने में सक्षम नहीं हैं जितना धनी लोग दे सकते हैं उनकी पहुँच से पानी दूर हो जाएगा।जल के निजीकरण के लिए सबसे बड़ी वजह निजी क्षेत्र का व्यावसायिक प्रभाव ही है।
प्रकृति ने हमें पानी प्रचूर मात्रा में दिया है।प्रकृति का यह उपहार स्वतंत्र रूप से बिना किसी विषमता के सब के लिए समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए।यह क़ानून के द्वारा  सरकार को सुनिस्चित करना चाहिए की इन संसाधनों का बचाव किया जाए और इसका किसी तरह का व्यावशायिकरण या निजीकरण न हो।नागरिकों की भी ज़िम्मेवारी बनती है कि पानी की बर्बादी नहीं करें एवं सरकार का प्रबंधन में सहयोग करें।
पीने योग्य पानी सभी सार्वजनिक रूप से मुफ़्त मिले यही हम सब का प्रयास होना चाहिए।