Monday, 31 August 2020

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 - अपेक्षा के अनुरूप या जुमला

बहुप्रतीक्षित और  बहुचर्चित राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई। आखिरी बार यह 1986 में तय किया गया था। हालांकि 1992 में थोड़े संशोधन किए गए थे। बदलती ज़रूरतों के अनुसार शिक्षा नीति में बदलाव की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी मगर अब तक 1986 में बनी नीति के अनुसार ही शिक्षा व्यवस्था का संचालित किया जा रहा था। यह शिक्षा नीति बदलते समय की कसौटी पर अनुपयोगी साबित हो रही थी जिसका लक्ष्य कुछ इंजिनियर,डॉक्टर, ऑफिसर, और कर्मचारी तैयार करना भर था।   2014 की चुनावी रैलियों में बीजेपी ने देश की शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा नीति में बदलाव की जरूरत का मुद्दा बनाया था। बीजेपी की सरकार बनने के बाद मोदी सरकार ने 2016 से ही नई शिक्षा नीति लाने की तैयारियां शुरू कर दी थी और इसके लिए टी एस आर सुब्रह्मण्यम कमेटी का गठन भी हुए था लेकिन सरकार को वह पसंद नहीं आया था।
इसके बाद सरकार ने वरिष्ठ शिक्षाविद, चांसलर और इसरो के पूर्व अध्यक्ष कस्तूरी रंगण की अध्यक्षता में एक नौ सदस्य  वाली कमेटी का गठन किया गया। व्यापक मंथन और हजारों सुझावों को समेट कर बनी नई  राष्ट्रीय शिक्षा नीति की अपने ढंग से समीक्षा हो रही है। विद्वान और शिक्षाविद इसकी विशेषताओं और कमियों की बात कर रहे हैं। लेकिन अच्छी बात यह है कि इस नीति की संकुचित दृष्टि से नहीं देखा जा रहा है।
सरकार द्वारा यह कहा जा रहा है कि यह नीति 21वीं सदी में नए भारत के निर्माण का आधार स्तम्भ है। नई शिक्षा नीति को भविष्य की नीति के तौर पर सरकार द्वारा प्रसारित किया जा रहा है। नई शिक्षा नीति ने कई ऐसे प्रावधान किए गए हैं जिसकी प्रतीक्षा लंबे समय से की जा रही थी। ऐसे प्रावधानों की सूची में सबसे ऊपर आता है " separation of functions या separation of powers".

देश की वर्तमान शिक्षा प्रणाली पूरी तरह से एक व्यक्ति अथवा विभाग केंद्रित व्यवस्था है। इसमें सरकार ( शिक्षा विभाग ) ही विद्यालय को वित्त प्रदान करती है। ऐसा होना किसी भी क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के लिए हानिकारक है। इस व्यवस्था में पक्षपात अवश्यंभावी हो जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में इसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। ऐसे तमाम नियम और कानून है जो निजी स्कूलों के प्रति कड़ा रुख अपनाते हैं जबकि सरकारी स्कूलों के प्रति उनका रवैया सहयोगात्मक रहता है। नई शिक्षा नीति में नियामक ( regulator ) और सेवा प्रदाता ( service provider ) के इस घाल मेल को दूर करने का प्रयास करते हुए  उन्हें अलग अलग करने की बात की गई है। इसके लिए status school standard authority (SSAAS)   बनाने का प्रावधान किया गया है।
नई नीति का दूसरा ज़रूरी बात है उसकी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने की बात। छात्रों के विद्यालय में दाखिल होने की दर 98% के वैश्विक स्वीकृत मानकों के आस पास ही है लेकिन National achievement survey और अन्य सर्वेक्षण की पुष्टि करते है कि 8 वीं कक्षा का छात्र तीसरी कक्षा के स्तर के गणित के प्रश्नों के हल करने में सक्षम नहीं है। पांचवी कक्षा का छात्र तीसरी कक्षा की हिंदी को पढ़ने में सक्षम नहीं है। देर से ही सही सरकार ने  कक्षाओं के आधार पर सीखने के स्तर को निर्धारित करने का फैसला किया है।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि कोई भी देश अपनी शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप अपने राष्ट्रीय मूल्यों के साथ अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है और भविष्य का निर्माण करता है। देश की नई शिक्षा नीति में इस तथ्य पर खास तौर पर गंभीरता के साथ ध्यान दिया गया है। इसी को ध्यान में रखकर प्रधान मंत्री ने कहा था कि बदलते समय देश में ऐसे युवा तैयार होंगे जो राष्ट्र निर्माण में अपनी सकारात्मक भूमिका निभा पाएंगे। 
नई शिक्षा नीति में भाषा, सभ्यता, संस्कृति एवं सामाजिक मूल्यों को समुचित महत्व मिला है। सरकार का दावा है कि नई शिक्षा नीति बहुमुखी व्यक्तित्व का निर्माण करने वाली है। नई नीति का स्वरूप भारतीय है। इसमें भारतीय ज्ञान के साथ साथ भारतीय आवश्यकताओं और विद्यार्थियों की कौशल ( skill ) विकसित करेगी। देश के अंदर आत्मनिर्भर और शसक्त भारत बनाने की बात हो रही है। ऐसे समय में यह नई शिक्षा नीति कारगर सिद्ध होगी। भारतीयों भाषाओं को  महत्व देना महत्वपूर्ण निर्णय है। स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक के पाठ्यक्रमों को कम करके सामान्य ज्ञान पर अधिक जोर दिया गया है।
नई शिक्षा नीति learning output  के साथ सम्पूर्ण विकास की बात करती है। childhood care education को लेकर भारत सरकार की प्राथमिकता शिक्षा की बुनियादी बदलाव को शसक्त बनाने की है। छठी कक्षा से ही vocational skill को पकड़ने का प्रावधान असल में उस बड़े लक्ष्य को पकड़ने के लिए है जिसके जरिए चीन और दक्षिण कोरिया जैसे मुल्कों ने दुनिया में अपनी आर्थिक हैसियत को कम समय में हासिल किया है। भारत की नई नीति चीन और कोरियाई मॉडल की तरह ही कौशल उन्नयन को सुनिश्चित करती है। नई नीति शिक्षा को मातृ भाषा और प्रादेशिक भाषाओं में देने की वकालत करती है। मौजूदा नीति केवल रटने वाली है और परीक्षा पास करने की अनुसरण करती है जबकि नई नीति जिज्ञासा केंद्रित होगी।

लेकिन ऐसा नहीं है सभी इससे खुश है। कई बिंदुओं को लेकर इसका विरोध हो रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि भारत का शिक्षा जगत निजी हाथों में सौंप दिया जाएगा जबकि भारत सरकार सम्मिलित रूप से शिक्षा के क्षेत्र में जी डी पी का 6% खर्च करने की बात कर रही है। लोगों का आरोप है 12वीं के बाद हुनरमंद बच्चों के स्थानीय स्तर पर नियोजन को लेकर है।दावा किया जा रहा है कि गरीब और वंचित तबके के बच्चे दिहाड़ी मजदूर में झोंक दिए जाएंगे। नई नीति में आरक्षण को लेकर भी सवाल किए जा रहे हैं।

मातृ भाषा के संबंध में कई लोग  सवाल उठा रहे हैं कि क्या जब बच्चा प्राथमिक कक्षाओं को पास करके आगे बढ़ेगा और उन्हें आगे की कक्षाओं में हिंदी और अंग्रेज़ी माध्यम में विषयों को पढ़ाया जाने लगेगा वे उसे सही ढंग से समझ पाएंगे या उच्च कक्षाओं में वे अंग्रेज़ी माध्यम के क्षात्रों से प्रतियोगिता कर पाएंगे ? इसके अलावा एक सवाल यह भी उठता है कि क्या स्थानीय या मातृ भाषा माध्यम में पर्याप्त  और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण सामग्री उपलब्ध होंगे।  कुछ छात्रों का मानना है कि सरकार मौजूदा नीति को खत्म कर अमेरिकी शिक्षा पद्धति की तरफ बढ़ रही है जहां पर शिक्षा एक   और व्यवसाय है। 
शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का फॉर्मूला क्या होगा ?  अध्यापकों की अनुपस्थिति कैसे सुनिश्चित कराई जा सकेगी। छात्रों की पसंद के स्कूलों में पढ़ने की इच्छा का सम्मान कब होगा ? महंगे निजी विद्यालयों की समस्या का समाधान कैसे और कब होगा।  ऐसे कई प्रश्न अभी अनुत्तरित है जिसका जवाब सरकार को तलाशना होगा।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लोगों के अपेक्षा के अनुरूप है या जुमला है,  ये आने वाला समय बताएगा।
 

Thursday, 6 August 2020

मंदिर निर्माण से जागी उम्मीद राष्ट्र राम राज्य की ओर !!!

आख़िरकार अयोध्या में राम मंदिर का भुमि पूजन हो गया और जल्द ही मंदिर का निर्माण शुरू हो जाएगा। इस मंदिर की प्रतीक्षा लगभग चार सौ वर्षों से भी ज्यादा से है। इस मंदिर के लिए न जाने कितने युद्ध हुए और लाखों ने अपने बलिदान दिए। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण सिर्फ मंदिर निर्माण नहीं है बल्कि भारत की संस्कृति का निर्माण है। यह एक राष्ट्र का मंदिर है जो भारतीयता के उत्कर्ष को इंगित करता है।
राम केवल हिन्दुओं के प्रतीक नहीं है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कुछ लोग राम के प्रति उस प्रकार के आदर भाव नहीं रखते लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई सत्य को पहचानने से इंकार कर दे तो सत्य असत्य तो नहीं हो सकता। सच तो यह है कि इस राष्ट्र को राम के प्रति नमन करना ही होगा तभी यह राष्ट्र भारत वर्ष कहलाएगा। इंडोनेशिया जो मुस्लिम बहुल राष्ट्र है राम का आदर और सम्मान करता है तब भारतीय राम को एक स्वर में नमन क्यों नहीं कर सकते ?
राम राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय स्वाभिमान, राष्ट्रीय आदर्शों और श्रेष्ठ मानव मूल्यों के प्रतीक हैं। उनपर समस्त राष्ट्र को गौरव होना चाहिए। जो राम को राष्ट्रीय गौरव नहीं मानते उन्हें सच्चा भारतीय नहीं कहा जा सकता चाहे वह किसी भी धर्म का हो।
राम का सम्पूर्ण जीवन हमारे स्वयं के जीवन को गहराई से देखने में मदद करता है। रा का अर्थ है " प्रकाश "  और म का अर्थ है " मै " ।  अर्थात हमारे जीवन का प्रकाश। अयोध्या का अर्थ है जिस पर विजय  प्राप्त नहीं किया जा सकता। 
राम केवल राजा होते, सदाचारी होते, धर्म प्रवर्तक होते तो शायद इतिहास में इतने लंबे अंतराल को पार कर उनकी स्मृति भी अन्य राजाओं और महाराजाओं की तरह क्षीण हो चुकी होती। मात्र इतिहास बनकर रह गए होते लेकिन  राम इतिहास नहीं है वे वर्तमान है। प्रभु राम तो पुरषोत्तम हैं। उनका प्रबंध कौशल, न्यायप्रियता, जनकल्याण तुलसीदास जी की इन चौपाइयों से झलकती है -  नहीं कोई दरिद्र दुखी न दीना , नहीं कोई अबुध न लक्षण हीना...........
दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज काहू नहीं व्यापा.......

मंदिर निर्माण के साथ साथ लोगों से अपेक्षा की जाती है कि इतनी प्रतीक्षा, युद्ध, और बलिदान के बाद लोगों को प्रभु राम की रीतियों, नीतियों से सीख कर कलयुग में राम राज लाएं।  मात्र जय श्री राम का नारा नहीं बल्कि राम के बताए रास्ते पर चलने और रामराज्य की परिकल्पना को साकार करने की जरूरत है।  तभी निजी तौर के साथ सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा।  राम मंदिर निर्माण की सदियों पुरानी प्रतीक्षा पूरी होना त्रेता युग के राम की कलयुग में एक विजय है।

Sunday, 2 August 2020

मित्रता बड़ा अनमोल रतन, कब उसे तोल सकता है धन? - दिनकर #FriendshipDay2020

वैसे तो हर दिन दोस्त्तो के लिए होता है लेकिन पूरे विश्व में आज के दिन दोस्त्तो और दोस्त्ती के लिए समर्पित कििया जाता है। ऐसे लोग अपने जीवन में मित्रों को महत्व देते हैं।
मित्र शब्द अपने आप में व्यापक आनंदमय और गंभीर है। मित्रता धन की तरह हैं जिसे आसानी से कमा तो सकते हैं परन्तु निरंतर सुरक्षित रखना कठिन है। सच्चा दोस्त कभी भी अपने मित्र को बुरे समय में, कठिनाई और परेशानी के वक़्त अकेले नहीं होने देते। सच्चे दोस्त को उचित समझ, संतोष और विश्वास की जरूरत है। सच्चा दोस्त कभी शोषण नहीं करता बल्कि एक दूसरे को जीवन में सही काम और मदद करने के लिए प्रेरित करता है।
सुकरात के शब्द है " मित्रता करने में शीघ्रता नहीं करो परन्तु जो मित्रता करो तो अंत तक निभाओ।"  मित्रता में व्यवहार और प्रतिमान होना चाहिए। नितिकारों ने सच्चे मित्र के कई लक्षण बताएं हैं। जैसे मित्र अपने साथी को गलत कम करने से रोकता है उसे हितकर कार्यों को अंजाम देने के लिए प्रेरित करता है उसकी गुप्त बातें किसी को नहीं बताता। इतिहास सच्चे मित्रों से भरा पड़ा है।  जैसे राम और सुग्रीव की मित्रता, कृष्ण और सुदामा की मित्रता, कृष्ण और अर्जुन की मित्रता इत्यादि।
लेकिन व्यक्ति के साथ मित्रता करना ऐसे है जैसे कि पानी पर रेखा खींचना। ऐसी मित्रता निरर्थक और क्षण भंगुर होती है। अज्ञानी और स्वार्थी की मित्रता खतरनाक होती है। स्वार्थी व्यक्ति की मित्रता छाया की भांति है। प्रकाश में छाया साथ चलता है किन्तु अंधकार होते ही गायब हो जाता है। मूर्ख और स्वार्थी मित्र से बुद्धिमान शत्रु अच्छा।


Friday, 31 July 2020

मुंशी प्रेमचंद को सच्ची श्रद्धांजली

आज करोना काल में दुनिया जितनी विचारवान है मेरी जानकारी में पहले कभी नहीं थी। राजनैतिक,सामाजिक एवं आर्थिक सबकुछ इस करोना ने बदल दिया है।
वर्तमान समय हमारे सामने बहुत सी  समस्याएं लेकर आई है। सारी दुनिया के लेखकों, कवियों को आगे आना चाहिए क्योंकि सभी लोग एक दूसरे की समस्याओं से परिचित हैं। कहानी और कविताओं के जरिए लोगों में हिम्मत, आत्मविश्वास एवं नई चेतनाओं को जगाने की जरूरत है। आज लेखक एवं कवि की जिम्मेदारी बढ़ गई है क्योंकि लेखक और कवियों ने हमेशा अपने कलम से समाज में चेतना को जगाया है। इसलिए आज विज्ञान और राजनीति से मायूस दुनिया की नज़रें लेखक और कवि की तरफ है।

आज मुंशी प्रेमचंद की जयंती है।  ईदगाह, शतरंज के खिलाड़ी, नमक का दारोगा, कर्मभूमि जैसे उपन्यास लिखने वाले प्रेमचंद जी आज २१ वीं शताब्दी में भी लोगों के दिल में बसते हैं।  प्रेमचंद, दिनकर जैसे लोगों ने अपने कलम से समाज को बदल दिया। वर्तमान परिस्थिति में लोगों में स्फूर्ति,साहस, विश्वास को जगाना ही प्रेमचंद जी को सच्ची श्रद्धांजली होगी।

Tuesday, 28 July 2020

वक़्त है भारत खुद को महाशक्ति के रूप में सोचे

वक़्त है भारत खुद को महाशक्ति की तरह सोचे।
-------------+-----------+----------+-----------------
मै अपने देश के प्रति समर्पित हूं किसी सरकार के प्रति मेरी निष्ठा नहीं बंधी है। सरकार किसी दल की हो उसके काम पर प्रशंसा और आलोचना की जानी चाहिए। सरकार की गलत निर्णय एवं नीतियों का विरोध भी होना चाहिए। लेकिन अच्छी नीति का  विरोध नहीं होना चाहिए।

प्रधान मंत्री मोदी ने अनेक साहसिक निर्णय लिया है जैसे जम्मू काश्मीर एवं लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाना, आर्टिकल ३७० हटाना, पाकिस्तान एवं मयनमार में सर्जिकल स्ट्राइक करना, सी ए ए  लगाना इत्यादि। लेकिन चीन के मामले में नरेंद्र  मोदी  का वह साहस नहीं दिख रहा है जिसकी जनता को अपेक्षा थी। भारत उसकी कूटनीति और आर्थिक ताकत को लेकर आशंकित है जिसकी वजह से टकराव के बजाय समझौते की पहल कर रहा है। प्रतीकात्मक रूप से कुछ चाइनीज ऐप्स को प्रतिबंधित कर सरकार ने अपनी इज्जत बचाई है। भाजपा ही नहीं  अब तक की सारी सरकारों का चीन के प्रति ऐसा ही रुख रहा है। चीन संजुक्त राष्ट्र संघ में काश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है। चीन परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह एन एस जी में भारत का रास्ता रोक हुए है। लेकिन भारत  की सरकारें  कभी किसी बहुपक्षीय मंच पर चीन को लेकर सवाल नहीं उठाए। चीन में मुसलमानों की स्थिति को लेकर भारत सवाल उठा सकता है। इससे भारत को  मुस्लिम देशों का समर्थन मिल सकता है।
लेकिन मालूम नहीं क्यों भारत सरकार ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती जिससे चीन नाराज़ हो जाए। ऐसा प्रतीत होता है जैसे दलाई लामा की राजनीतिक गतिविधियां बंद करा दी गई है। प्रधान मंत्री मोदी द्वारा दलाई लामा की जन्मदिन के अवसर पर बधाई संदेश का ट्विटर आदि पर  नहीं दिखना  आश्चर्य की बात है। बाजपेई सरकार ने  भी तिब्बत को चीन का हिस्सा माना था।  गलवान घाटी वाली घटना के बाद व्हाट्सएप पर "  बॉयकॉट चीन " के नारों  से भर गया था।  लेकिन कुछ  ही हफ्ते में सारे नारे गायब हो गए।  कहीं ऐसा तो नहीं  भाजपा के कार्यकर्ता को ऐसा करने से  रोका गया हो।  
क्या हमे चीन से खौफ है।  वक़्त  आ गया है भारत खुद को महाशक्ति की तरह सोचे। गलवान घाटी के हादसे ने भी यही साबित किया है कि भले ही आज का भारत  १९६२ जैसा नहीं है पर यह सच है कि चीन की चुनौतियों से पूरी तरह से निपटने मै उम्मीद के रूप में कामयाब नहीं है।  इस स्थिति को बदलने की आवश्यकता है।  हमे अपने देश की अर्थतंत्र को  मजबूत करना होगा।  आज अधिकतर देश सेना से ज्यादा आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में लगे हुए हैं। हमे हर हाल में आत्मनिर्भर बनना होगा। हमे चीन और अमेरिका  दोनों पर आर्थिक निर्भरता कम करनी होगी। हमे अपनी परंपरागत उद्योग धंधों को फिर से खड़ा करना होगा। हमे ऐसा माहौल बनाना होगा जिससे प्रतिभाओं का पलायन नहीं हो। भारत के लिए यह सुअवसर है कि अपनी अंदरुनी ढांचे और कौशल को  दुरुस्त करे और महाशक्ति बने। 

चीन भारत  को युद्ध में ऊलझा कर उसी तरह महाशक्ति बनने में अवरोध खड़े कर रहा है जिस प्रकार सन् १९५०-६० के दशक में अमेरका ने चीन को युद्ध में उलझाए  रखा था। अंततः चीन मजबूर होकर अमेरिका का बाज़ार बन गया था।  अब चीन भारत को अपना बाज़ार बनाकर पूर्व की अमेरिकी नीति की पुनरावृत्ति करना चाह रहा है। इससे भारत को बचना होगा।  

Saturday, 18 July 2020

पर्यावरण को जन आन्दोलन बनाना ज़रूरी

कहीं आग लगती है तो मुहल्ले के सभी लोग दौड़ते है। कोई बालटियों में पानी लेकर दौड़ता है तो कोई धूल मिट्टी फेंकता है।सभी लोग कुछ न कुछ करते हैं जिससे आग पर जल्द से जल्द क़ाबू की जाए।ऐसा तो नहीं होता कि सभी हाँथों को बाँध कर फ़ायर ब्रिगेड की इंतज़ार करते हैं।
इसी प्रकार पर्यावरण को बचाने के लिए हम सरकार द्वारा उठाए गए क़दमों के ही भरोसे कैसे रह सकते हैं। जलवायु बदल रही है तो इसमें हम क्या करें,  हमने थोड़े ही न तापमान बढ़ाया है। ये सब तो सरकारों का काम है। पूरे दूनिया में तापमान बढ़ रहा है मेरे सिर्फ़ अकेले से क्या होगा ? ऐसे सोच से बचना चाहिए। स्वार्थपूर्ण प्रवृति वाले ये बोल अक्सर सुनने को मिलता है लेकिन यह नुक़सानदेह है। एक एक व्यक्ति को पर्यावरण बचाने के लिए आगे आना चाहिए। हमें यह समझना ज़रूरी है कि सब कुछ सरकारें नहीं कर सकतीं हमारी भी ज़िम्मेवारी बनती है।
बारिश की बूँदों को संजोकर रखना, नदी, समुद्र में पौलिथिन, प्लास्टिक को नहीं फेंकना, सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना, पेड़ों को लगाना, सिंगल यूज़ प्लास्टिक को इस्तेमाल नहीं करना इत्यादि काम प्रत्येक व्यक्ति का है। गाँव ख़ाली हो रहे हैं और शहरों में रहने की जगह नहीं है। यह असंतुलन हमलोग ख़ुद बढ़ा रहे हैं। अतः सभी को असंतुलन से पैदा ऊँच नीच का ज्ञान आवश्यक है। प्राकृतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, और आर्थिक, आदि समस्याओं का संरक्षण तभी संभव होगा जब पर्यावरण सम्बन्धी जनचेतना होगी। अशुद्ध वातावरण से मानव का विनाश अवश्यमभावी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि शीघ्र ही यदि प्रकृति का संतुलन क़ायम न किया गया तो हमें औक्सीजन गैस के सिलिंडर साथ लेकर जीवन के लिए भटकना होगा। मानव को जितनी औक्सीजन की आवश्यकता होती है उसका लगभग आधा भाग सूर्य से प्राप्त होता है। किंतु प्रकृति के असंतुलन के फलस्वरूप हमें वह लाभ नहीं मिल पा रहा है। गाड़ियों और अन्य प्रकार के ध्वनि प्रदूषण से दिल की रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। रासायनिक खाद व अन्य रासायनिक तत्वों के पानी में घुलमिल जाने से जल हानिकारक होता जा रहा है। व्यक्ति के चारों ओर जो कुछ भी है पर्यावरण के अंतर्गत है। इस पर्यावरण ने सारी सृष्टि को सदियों से बचाए रखा है। यदि हम स्वयं  को या समस्त सृष्टि को बचाए रखना चाहते हैं तो पर्यावरण को सरकार के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। भारत सरकार ने क्लायीमेट  चेंज की चुनौतियों को प्राथमिकता दी है। पिछले पाँच साल में भारत ने 38 मिलियन कार्बन उत्सर्जन कम किया है। सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने का अभियान चलाया गया है। फिर भी अभी सरकार के सामने बहुत से पर्यावरण सम्बन्धी चुनौतियाँ हैं जिसे करना बाक़ी है। बरहाल जो काम सरकारों का है वह करती रहेगी लेकिन यह धरती हमारी है इसे बचाना हमारी ज़िम्मेवारी है। ज़रूरी है कि हम भी अपनी सामुदायिक व व्यक्तिगत भूमिका का आँकलन करें और उन्हें अपनी आदत बनाए। हमें पूरी ईमानदारी से पर्यावरण के सुधार में जुट जाना चाहिए जिससे क़ुदरत के घरौंदे बच जाए। पर्यावरण के लिए मूलमंत्र एक ही है “ क़ुदरत से जितना और जैसे लें उसे कम से कम उतना और वैसा लौटाएँ “।
चित्र : सौजन्य गूगल

Wednesday, 15 July 2020

अगला प्रधान मंत्री कौन ?

मुझे नितिन गड़करी से मिलने का अवसर फ़िक्की ( FICCI ) के एक कार्यक्रम के दौरान मिला था। उनके द्वारा दिए गए भाषण से बहुत प्रभावित हुआ था। भाषण के बाद वहाँ लगाए गए विभिन्न स्टालों का मुआयना के वक़्त मैं भी उनके साथ था। जिस प्रकार वह आइ॰आइ॰टी॰ मुंबई और दूसरे स्टाल पर उनके उत्पादों पर चर्चा करते हुए सुझाव दे रहे थे मैं हैरान था। आम तौर पर लोगों पर राजनीतिज्ञ की अवधारणा ग़लत बनी हुई है लेकिन गड़करी एक समझदार, जानकार और सुलझे हुए व्यक्ति हैं। उनके पास ऐसे कई योजनाएँ हैं जो कार्यान्वित हो जाए तो देश से ग़रीबी, बेरोज़गारी दूर हो जाएगी।
केंद्रीय मंत्री के तौर पर नितिन गड़करी सड़क परिवहन मंत्रालय एवं MSME मंत्रालय संभाल रहे हैं।देश में सड़क बनाने वाले मंत्री से भी जाने जाते हैं। छोटे और मध्यम उद्योग दोनो सम्भालते हैं।लक्ष्य निर्धारित करते हैं फिर अफ़सरों के साथ मिलकर निर्धारित समय में कार्यान्वित करते हैं।  वह अपनी बातों को सीधा,सरल और आँकड़ों में लोगों को समझते हैं। उन्होंने MSME पर अपना ध्यान केंद्रित करने का कारण बताया। उन्होंने बताया कि MSME से देश में 28 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि होती है तथा 49 प्रतिशत का निर्यात होता है। इससे 11 करोड़ रोज़गार का सृजन होता है। उन्होंने अपने कार्यकाल में सड़कों की जाल बिछा दी। देश की सबसे पहली बनी मुंबई पुणे एक्सप्रेस हाईवे गड़करी की देन है। उनका लक्ष्य था 40 कि॰मी॰ प्रतिदिन सड़क बनाने का जो आज 32 कि॰मी॰ तक पहुँच गया है। उन्होंने हमेशा इस बात पर बल दिया है कि ग्रामीण क्षेत्र एवं वनीय क्षेत्र में कुटीर उद्योग उद्योग लगे और उन उत्पादों को निर्यात हो। इसलिए उनका प्रयास रहा है कि सड़के उन्ही क्षेत्र में बने जिससे आवागमन की अच्छी सुविधा मिल सके। इसका उदाहरण नयी निर्मणधिन दिल्ली मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग है।
उनके पास कमाल के योजनाएँ होतीं हैं जो हैरान करतीं हैं।उन्होंने वैकल्पिक ईंधन बायोडीज़ल को बढ़ावा देने पर ज़ोर दिया जिससे ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन कम हो। बिजली से चलने वाली गाड़ियों को देश में अनिवार्य करना इनकी प्राथमिकता है। उनका भारत में बिजली से चलने वाली गाड़ियों के निर्माण का हब बनाने की योजना है। गंगा नदी में मालवाहक जहाज़ का चलाना उन्होंने शुरू की जिससे समय और ईंधन की बचत होती है। 
नरेंद्र मोदी वर्ष 2024 तक प्रधान मंत्री रहेंगे इसमें कोई शक नहीं। लेकिन 2024 के चुनाव के बाद उनका प्रधान मंत्री बने रहना मुश्किल हो सकता है जिसका कारण ढलती उम्र होगी। उसके बाद भाजपा का नेतृत्व कौन करेगा यह बहुत बड़ा सवाल भाजपा और संघ के सामने होगा। भाजपा के पास दो विकल्प होंगे नितिन गड़करी और अमित शाह। दोनो की उम्र कम और अपनी विशिष्टता है। आज अमित शाह की लोकप्रियता ज़्यादा हो सकती है लेकिन यह ज़्यादा दिनों तक रहेगी इसमें शक है।
इस बात से शायद ही किसी का मतभेद हो कि गड़करी के व्यक्तित्व के गुणों में विशिष्ट उदारता के गुण की तरफ़ लोगों का आकर्षण रहा है। गड़करी और शाह ने शुरू से ही राजनैतिक जीवन संघ में ही बिताया। इसके बावजूद गड़करी की छवि एक उदार नेता की है। गड़करी को कभी भी जुमले देते नहीं सुना। जबकि आज सरेआम कोई बयान देकर उसे झूठलाने की राजनैतिक शैली भारतीय राजनीति में हद दर्जे तक परवान बढ़ चुकी है। अंत में मैं यह कह सकता हूँ कि नितिन गड़करी की तरह जानकार और सूझ बुझ वाले नेता भारतीय राजनीति में कम हैं।